जय छत्तीसगढ़ महतारी

पुरखा

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डॉ. खूबचंद बघेल

सामान्य परिचय:

नाम:    डॉ. खूबचंद बघेल (Dr. Khubchand Baghel)
जन्म:   19 जुलाई 1900 
स्थान:  ग्राम पथरी, रायपुर। 
पिता:   जुड़ावन प्रसाद 
माता:   केकती बाई 
पत्नी:    राजकुँवर 
निधन:  22 फरवरी 1969 
 

शिक्षा:

डॉ. खूबचंद बघेल (Dr. Khubchand Baghel) जी की प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही प्राइमरी स्कूल से हुआ। आगे की पढ़ाई उनकी रायपुर के गवर्नमेंट हाई स्कूल से पूर्ण हुई। अपनी मैट्रिक की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने नागपुर के रॉबर्ट्सन मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया। 
 
वर्ष 1920-21 में देश भर में चलने वाले असहयोग आंदोलन के प्रभाव में आकर उन्होंने बीच में ही इसे छोड़ दिया और आंदोलन में शामिल हो गए। घर वालों के बार बार बोलने और समझने से उन्होंने पुनः एल.एम.पी. (लेजिस्लेटिव मेडिकल प्रक्टिसनर) नागपुर में दाखिला लिया और साल 1923 में एल.एम.पी. की परीक्षा पास की जिसे बाद में एल.एम.पी. को सरकार द्वारा एम.बी.बी.एस. का दर्जा दिया गया। 
 

विवाह एवं संतान :

डॉ. खूबचंद बघेल (Dr. Khubchand Baghel) का विवाह बहुत की काम उम्र में करा दिया गया था, जब वे अपनी प्राथमिक की पढ़ाई कर रहे थे तो सिर्फ 10 वर्ष के उम्र में उनका विवाह उनसे साल में 3 वर्ष छोटी कन्या राजकुँवर से करा दिया गया था। उनकी पत्नी राजकुँवर से 3 पुत्रियाँ पार्वती, राधा और सरस्वती का जन्म हुआ। बाद में उन्होंने पुत्र मोह के कारण डॉ. भारत भूषण बघेल को गोद लिया। 
 

सामाजिक दायित्व और कुरीतियों का नाश :

डॉ. खूबचंद बघेल (Dr. Khubchand Baghel) का हमेशा से सामाजिक कुरीतियों को देखकर खून खौल उठता था वे हमेशा इन बुराइयों को समाज से दूर करने के लिए बहुत सारे प्रयास किये जिसके फलस्वरूप उन्हें अनेकों बार समाज के गुस्से का सामना करना पड़ा है। 
 
पुरे देश की तरह छत्तीसगढ़ में छुआछूत, ऊँच- नीच की भावना व्याप्त थी उसी की कुछ उदाहरण यहाँ प्रस्तुत किये गए हैं। बात तब की है जब गांवों के नाई, सतनामी समाज के लोगों के बाल काटने को राजी नहीं होते थे इस व्यथा को देखकर सेठ स्व. अनंत राम बर्छिहा जी ने उनके बाल काटे और दाढ़ी भी बनाई इसी से क्षुब्ध होकर कुर्मी समाज ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया, जिसे डॉ. साहब ने देखकर "ऊँच-नीच" नामक नाटक की रचना कर प्रदर्शन किया, जिसके प्रभाव से ही बर्छिहा जी का सामाजिक बहिष्कार को रद्द किया गया। 

खूबचंद जी का सामाजिक बहिष्कार :

डॉ. खूबचंद बघेल (Dr. Khubchand Baghel) ने जब से अपना होश सम्हाला था तब से उन्हें जातिगत भेद भाव से चिढ़ थी, उन्होंने जातिगत भेद भाव के साथ साथ उपजातिगत भेद भाव को भी दूर करने का काम किया जिसके फलस्वरूप आज के समय में कुर्मी समाज में व्याप्त उपजाति भेदभाव को दूर किया जा सका है।  
 
इस भेदभाव को मिटाने के लिए डॉ. बघेल जी स्वयं मनवा कुर्मी के थे परन्तु उन्होंने अपनी एक पुत्री का विवाह दिल्लीवार कुर्मी समाज में तथा सबसे छोटी बेटी का विवाह पटना के राजेश्वर पटेल जी से करवाया फलस्वरूप उन्हें समाज के क्रोध के कारण कुर्मी समाज से बहिष्कृत कर दिया गया। परन्तु वे हमेशा से इस उपजाति बंधन को तोड़ने में लगे रहे।  

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राजिम माता का इतिहास 

राजिम माता का इतिहास, राजीव माता की भक्ति, राजिम देवी का मंदिर, राजिम माता का मंदिर, राजिम क्यों प्रसिद्ध है, राजिम को छत्तीसगढ़ का प्रयाग क्यों कहते हैं

भारत के छत्तीसगढ़ राज्य का राज्य क्षेत्र रायपुर जिले में महानदी के तट पर स्थित है यहां राजीव लोचन भगवान रामचंद्र का प्राचीन मंदिर है राजिम का प्राचीन नाम पदम क्षेत्र था पदम पुराण के पाताल खंड के अनुसार भगवान राम का इस स्थान से संबंध बताया गया है राजिम में महानदी और पेरी नामक नदियों का संगम है

संगम स्थल पर “कुलेश्वर” महादेव का प्राचीन मंदिर है इस मंदिर का संबंध राजिम की भक्ति माता से है छत्तीसगढ़ राज्य के राजिम क्षेत्र राजीम माता के त्याग की कथा प्रचलित है और भगवान कुलेश्वर महादेव का आशीर्वाद क्षेत्र को प्राप्त है

7 जनवरी को राजिम माता की जयंती मनाई जाती है राजीव लोचन मंदिर में लगे शिलालेख के अनुसार कलचुरी राजा जगपाल देव के शिलालेख में माता का उल्लेख मिलता है 3 जनवरी 1145 को यह शिलालेख लगाया गया था 

राजीव माता की भक्ति 

महानदी के श्री संगम पर स्थित राजिम एक महान और प्राचीन तीर्थ है यहां के मुख्य मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा राजीव लोचन के नाम से प्रसिद्ध है इस नगर के राजिम नामकरण का भी एक इतिहास है इस नगर में राजिम नामक एक गरीब धार्मिक स्वभाव की घरेलू महिला थी वह तेल बेच कर अपना और परिवार का पालन पोषण करती थी

एक दिन जब वह तेल बेचने जा रही थी तो भूमि में गड्ढे एक पत्थर में उसका पैर टकरा गया सिर पर रखा तेल का पात्र गिरने से तेल बह गया उसे डर था कि खाली हाथ लौटने पर उसे अपने पति और सास से बुरी तरह प्रताड़ित होना पड़ेगा इसके बाद वह भगवान से प्रार्थना करने लगी कि सास और पति के प्रकोप और दंड से उसकी रक्षा करें तभी उसने देखा कि पात्र फिर तेल से लबालब भरा हुआ है इसके बाद उस स्थान को सावधानीपूर्वक खोदकर पत्थर को भूमि से ऊपर निकाला

यह देखकर आश्चर्य में पड़ गई जिसे वह पत्थर समझ रही थी वह भगवान विष्णु की चतुर्भुजी प्रतिमा थी उसको समझ में आ गया कि यह जो चमत्कार मेरे साथ हुआ है कि तेल गिरने के बाद फिर के बर्तन में आ गया यह हो ना हो भगवान की कृपा है वह बड़ी श्रद्धा के साथ भगवान की प्रतिमा को घर ले गई इसके बाद प्रतिमा को शुद्ध जल से नहला कर एक कमरे में उसने प्रतिष्ठित कर दिया और रोज उसकी पूजा उपासना करने लग गई यही उसका नित्यक्रम हो गया

1 दिन उस समय के तत्कालीन शासक थे विलासतुंग को स्वप्न में आदेश हुआ कि राजिम में भगवान विष्णु का भव्य मंदिर निर्माण करवाए अब स्वपन के आदेश अनुसार राजा ने इसको सत्य मानते हुए और पंडितों से सलाह विमर्श करके छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से चुने हुए कलाकारों को आमंत्रित किया और शुभ मुहूर्त में मंदिर पुरा बनकर के तैयार हो गया था अब लोगों ने उन्हें बताया कि राजिम तेली के घर में एक मूर्ति पहले से विराजमान है

जब से वह सजीव मूर्ति उनके घर में प्रतिष्ठित हुई है तब से वह लोग सुखी और संपन्न रहने लगे हैं तो राजा को भी लगा कि सचमुच में इस मंदिर के लायक वही मूर्ति हो सकती हैं जो पहले से ही सजीव है, उसका प्रभाव प्रत्यक्ष है इसके बाद राजा स्वर्ण मुद्राओं का थाल भरकर राजिम के पास गया और उससे वह मूर्ति मांगी तब राजिम ने उस मूर्ति का सौदा करने से इनकार कर दिया इसके बाद राजा ने राजिम की चुप्पी को स्वीकृति समझ कर अपने सैनिकों को मूर्ति उठाने का आदेश दिया परंतु उनके भरपूर प्रयास के बाद भी वह मूर्ति टस से मस नहीं हुई

इसके बाद राजा ने हाथ जोड़कर माता राजिम को प्रतिमा ले जाने का उपाय पूछा फिर राजिम ने कहा यदि आप में श्रद्धा और भक्ति पूर्वक संपूर्ण समर्पण की भावना है तभी यह प्रतिमा आपके साथ मंदिर में जा सकती है और साथ ही राजिम ने यह भी कहा कि मुझे कुछ नहीं चाहिए हो सके तो भगवान के इस तीर्थ के साथ मेरा नाम भी कहीं जुड़ जाए तो अच्छा हो उनकी इच्छा के अनुरूप राजा ने इस तीर्थ नगर का नाम “राजिम प्रसिद्ध” किया भगवान विष्णु की प्रतिमा राजीव लोचन के नाम से विख्यात हुई 

राजिम देवी का मंदिर 

राजिम देवी की स्मृति में एक मंदिर का भी निर्माण किया गया है जिसे लोग तेलीन के नाम से जानते हैं राजिम माता की इस कथा का उल्लेख रायपुर जिला गजेटियर 1909 में भी हुआ है राजिम में स्थित तेलीन मंदिर इस लोक अनुश्रुति के मूल में संभावित ऐतिहासिकता को प्रमाणित करने वाला साक्ष्य है

इस मंदिर के गर्भ गृह में पूजार्थ एक शिलापट्ट ऊंची वेदी पर  पृष्ठ भित्ति से सटाकर रखा हुआ है इसके सम्मुख पटल के ऊपर भाग पर खुली हथेली, सूर्य, चंद्र, पूर्ण कुंभ की आकृतियां उत्कीर्ण है नीचे एक पुरुष और एक स्त्री की सम्मुख अभिमुख पद्मासन में बैठी हाथ जोड़े प्रार्थना की मुद्रा में प्रतिमाएं अंकित है इनके दोनों पक्षों में एक-एक परिचारिका की मूर्ति है

शीला पट्टी के मध्य भाग में जुए में जूते हुए बैल कोल्हू का रूपांकन है यह शीला पट सती स्तंभ है इसे आधार मानकर रायबहादुर हीरालाल ने व्यक्त किया है कि वह अपने आराध्या भगवान ‘राजीवलोचन’ के सामने सती हुई थी रायबहादुर हीरालाल ने जूते बैल से युक्त कोहलू को राजिम तैलिन की वंश परंपरा से चले आने वाले व्यवसाय की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति की है 

राजिम माता का मंदिर 

भगवान श्रीराम ने अपने वनवास काल में दंडकारण्य जाने के लिए इसी मार्ग का अनुसरण किया था राजिम से कुछ ही दूरी पर चंपारण जो महाप्रभु वल्लभाचार्य का जन्म स्थान है जो इसके पुण्य क्षेत्र होने के प्रमाण हैं

प्राचीन काल से यहां लोमस ऋषि आश्रम ,धोम्मय ऋषि आश्रम तथा कुलेश्वर महादेव मंदिर स्थित है प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से राजिम में 1 माह का मेला भरता है महानदी पैरी और संदूर नदियों का संगम होने के कारण महाभारत काल से इसे धार्मिक महत्व प्राप्त रहा है महाभारत में उल्लेखित बद्री तीर्थ की समता राजिम तीर्थ से की है प्राचीन ग्रंथों में इसे “पदम” क्षेत्र भी कहा गया है

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सुन्दरलाल शर्मा जीवनी

पं. सुन्दरलाल शर्मा, नाट्यकला, मूर्तिकला व चित्रकला में पारंगत विद्वान थे।  'प्रहलाद चरित्र', 'करुणा-पचीसी' व 'सतनामी-भजन-माला' जैसे ग्रंथों के वह रचयिता है। इनकी 'छत्तीसगढ़ी-दीन-लीला' छत्तीसगढ़ का प्रथम लोकप्रिय प्रबंध काव्य है। छत्तीसगढ़ की राजनीति व देश के स्वतंत्रता आन्दोलन में उनका ऐतिहासिक योगदान है। पं. सुन्दरलाल शर्मा का जन्म सन 1881 में छत्तीसगढ़ प्रांत के राजिम के पास चमसूर ग्राम में हुआ था। उन्होंने लगभग 18 ग्रन्थ लिखे जिनमें 4 नाटक, 2 उपन्यास तथा शेष काव्य रचनाएँ है । राजिम में 1907 में संस्कृत पाठशाला व रायपुर में सतनामी-आश्रम की स्थापना की तथा 1910 में राजिम में प्रथम स्वदेशी दुकान व 1920 के कण्डेल सत्याग्रह के सूत्रधार थे। 28 दिसंबर, 1940 को आपका स्वर्गवास हुआ।

राजिम के पास एक गांव है जिसका नाम है चमसुर। उसी चमसुर गांव में पं. सुन्दरलाल शर्मा का जन्म हुआ था। उनका जन्म विक्रम संवत 1938 की पौष कृष्ण अमावस्या अर्थात् 1881 ई० को हुआ था। इनके पिता थे पं. जयलाल तिवारी जो कांकेर रियासत में विधि सलाहकार थे, उनकी मां थीं देवमती देवी। पं. जयलाल तिवारी बहुत ज्ञानी एंव सज्जन व्यक्ति थे। कांकेर राजा ने उन्हें 18 गांव प्रदान किये थे। पं. जयलाल तिवारी बहुत अच्छे कवि थे और संगीत में उनकी गहरी रुचि थी। पं. सुन्दरलाल शर्मा की परवरिश इसी प्रगतिशील परिवार में हुई। चमसुर गांव के मिडिल स्कूल तक सुन्दरलाल की पढ़ाई हुई थी। इसके बाद उनकी पढ़ाई घर पर ही हुई थी। 

उनके पिता ने उनकी उच्च शिक्षा की व्यवस्था बहुत ही अच्छे तरीके से घर पर ही कर दी थी। शिक्षक आते थे और सुन्दरलाल शर्मा ने शिक्षकों के सहारे घर पर ही अंग्रेजी, बंगला, उड़िया, मराठी भाषा का अध्ययन किया। उनके घर में बहुत-सी पत्रिकाएँ आती थीं, जैसे- "केसरी" (जिसके सम्पादक थे लोकमान्य तिलक) "मराठा"। पत्रिकाओं के माध्यम से सुन्दरलाल शर्मा की सोचने की क्षमता बढ़ी। किसी भी विचारधारा को वे अच्छी तरह परखने के बाद ही अपनाने लगे। 

खुद लिखने भी लगे। कविताएँ लिखने लगे। उनकी कवितायें प्रकाशित भी होने लगीं। 1898 में उनकी कवितायें रसिक मित्र में प्रकाशित हुई। सुन्दरलाल न केवल कवि थे, बल्कि चित्रकार भी थे। चित्रकार होने के साथ-साथ वे मूर्तिकार भी थे। नाटक भी लिखते थे। रंगमंच में उनकी गहरी रुचि थी। वे कहते थे कि नाटक के माध्यम से समाज में परिवर्तन लाया जा सकता है।

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में व्याप्त रुढ़िवादिता, अंधविश्वास, अस्पृश्यता तथा कुरीतियों को दूर करने के लिए आपने अथक प्रयास किया। आपके हरिजनोद्धार कार्य की प्रशंसा महात्मा गांधी ने मुक्त कंठ से करते हुए, इस कार्य में आपको गुरु माना था। 1920 में धमतरी के पास कंडेल नहर सत्याग्रह आपके नेतृत्व में सफल रहा। आपके प्रयासों से ही महात्मा गांधी 20 दिसम्बर 1920 को पहली बार रायपुर आए।

असहयोग आंदोलन के दौरान छत्तीसगढ़ से जेल जाने वाले व्यक्तियों में आप प्रमुख थे। जीवन-पर्यन्त सादा जीवन, उच्च विचार के आदर्श का पालन करते रहे। समाज सेवा में रत परिश्रम के कारण शरीर क्षीण हो गया और 28 दिसम्बर 1940 को निधन हुआ। छत्तीसगढ़ शासन ने उनकी स्मृति में साहित्य/आंचिलेक साहित्य के लिए पं. सुन्दरलाल शर्मा सम्मान स्थापित किया है।

19 वीं सदी के अंतिम चरण में देश में राजनैतिक और सांस्कृतिक चेतना की लहरें उठ रही थी। समाज सुधारकों, चिंतकों तथा देशभक्तों ने परिवर्तन के इस दौर में समाज को नयी सोच और दिशा दी। छत्तीसगढ़ में आपने सामाजिक चेतना का स्वर घर-घर पहुंचाने में अविस्मरणीय कार्य किया। आप राष्ट्रीय कृषक आंदोलन, मद्यनिषेध, आदिवासी आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन जुड़े और स्वतंत्रता के यज्ञवेदी पर अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में व्याप्त रुढ़िवादिता, अंधविश्वास, अस्पृश्यता तथा कुरीतियों को दूर करने के लिए आपने अथक प्रयास किया। आपके हरिजनोद्धार कार्य की प्रशंसा महात्मा गांधी ने मुक्त कंठ से करते हुए, इस कार्य में आपको गुरु माना था। 1920 में धमतरी के पास कंडेल नहर सत्याग्रह आपके नेतृत्व में सफल रहा। आपके प्रयासों से ही महात्मा गांधी 20 दिसम्बर 1920 को पहली बार रायपुर आए।

असहयोग आंदोलन के दौरान छत्तीसगढ़ से जेल जाने वाले व्यक्तियों में आप प्रमुख थे। जीवन-पर्यन्त सादा जीवन, उच्च विचार के आदर्श का पालन करते रहे। समाज सेवा में रत परिश्रम के कारण शरीर क्षीण हो गया और 28 दिसम्बर 1940 को आपका निधन हुआ। छत्तीसगढ़ शासन ने उनकी स्मृति में साहित्य/आंचिलेक साहित्य के लिए पं. सुन्दरलाल शर्मा सम्मान स्थापित किया है।

योगदान :

19वीं सदी के अंतिम चरण में देश में राजनैतिक और सांस्कृतिक चेतना की लहरें उठ रही थीं। समाज सुधारकों, चिंतकों तथा देशभक्तों ने परिवर्तन के इस दौर में समाज को नयी सोच और दिशा दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। छत्तीसगढ़ में सुन्दरलाल शर्मा ने सामाजिक चेतना का स्वर घर-घर पहुंचाने में अविस्मरणीय कार्य किया। वे 'राष्ट्रीय कृषक आंदोलन', 'मद्यनिषेध', 'आदिवासी आंदोलन', 'स्वदेशी आंदोलन' से जुड़े और स्वतंत्रता के यज्ञवेदी पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में व्याप्त रुढ़िवादिता, अंधविश्वास, अस्पृश्यता तथा कुरीतियों को दूर करने के लिए पण्डित सुन्दरलाल शर्मा ने अथक प्रयास किया। उनके हरिजनोद्धार कार्य की प्रशंसा महात्मा गाँधी ने मुक्त कंठ से करते हुए इस कार्य में इन्हें अपना गुरू माना था। 1920 ई. में धमतरी के पास 'कंडेल नहर सत्याग्रह' इनके नेतृत्व में ही सफल रहा था। इनके प्रयासों से ही महात्मा गाँधी 20 दिसम्बर, 1920 को पहली बार रायपुर आए थे।

पँ सुंदरलाल शर्मा जी की रचनाएँ :

  दानलीला (खंडकाव्य), राजिम क्षेत्र महात्मय, श्री प्रहलाद चरित  (नाटक), श्री ध्रुवचरित (नाटक) , करुणा पच्चीसी, विक्टोरिया वियोग, श्री रघुनाथ गुण कीर्तन, प्रताप पदावली, छत्तीसगढी रामलीला, सतनामी भजनमाला,

जेलयात्रा :   पण्डित सुन्दरलाल शर्मा 'असहयोग आन्दोलन' के दौरान छत्तीसगढ़ से जेल जाने वाले व्यक्तियों में प्रमुख थे।

निधन :  सुन्दरलाल शर्मा जीवन-पर्यन्त सादा जीवन, उच्च विचार के आदर्श का पालन करते रहे। सदैव समाज सेवा में रत रहने और अत्यधिक परिश्रम के कारण शरीर क्षीण हो गया और 28 दिसम्बर, 1940 को इनका देहावसान हुआ। छत्तीसगढ़ शासन ने उनकी स्मृति में साहित्य/आंचिलेक साहित्य के लिए 'पण्डित सुन्दरलाल शर्मा सम्मान' स्थापित किया है।

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हरि ठाकुर

हरि ठाकुर का जन्मः १६ अगस्त १९२७, में रायपुर में हुआ उन्होंने बी.ए., एल एल. बी. तक शिक्षा प्राप्त की तथा वकालत को अपना व्यवसाय बनाया। आजादी की लडाई के मह्त्वपूर्ण सिपाही स्व. श्री हरि ठाकुर हिन्दी के वरिष्ठतम गीतकारों में एक सम्मानित नाम हैं। इनकी 30 से अधिक कृतियाँ प्रकाशित और चर्चित रही हैं। छत्तीसगढ के महत्वपूर्ण इतिहासविद्, स्वतंत्रतासंग्राम सेनानी के रूप में जाने जाने वाले हरि ठाकुर की छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण में महती भूमिका रही है।[1] वे 1942 के आंदोलन से लेकर 1955 के गोवा मुक्ति स्वतंत्रता संग्राम तक सक्रिय रहे। भूदान आंदोलन में भागीदारी की, 1954 में नागपुर भूदान की पत्रिका साम्ययोग का संपादन किया और 1960 में छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की। 1965-65 में वे संज्ञा मासिक पत्रिका के संपादक बने और 1967-68 में साप्ताहिक राष्ट्रबंधु के। वे छत्तीसगढ़ रारज्य निर्माण संयोजन समिति के संयोजक भी रहे। 1995 में उन्होंने सृजन सम्मान संस्था की स्थापना गठन और 2001 तक इसके अध्यक्ष रहे।[2] कृतियाँ –

कविता संग्रह

01. लोहे का नगर

02. नये विश्वास के बादल

03. जय छत्तीसगढ़

04. पौरूषः नये संदर्भ

05. मुक्ति गीत

06. धान के कटोरा

07. बानी हे अनमोल

08. छत्तीसगढ़ी गीत अउ कविता

09. गीतों के शिलालेख

10. शहीद वीर नारायण सिंह

11. हँसी एक नाव सी (गीत संकलन)

इतिहास, शोध, जीवनी

01. त्यागमूर्ति ठा. प्यारे लाल सिंह

02. छत्तीसगढ़ के रत्न

03. उत्तर कोसल बनाम दक्षिण कोसल

05. छत्तीसगढ़ के इतिहास पुरूष

06. छत्तीसगढ़ गाथा

07. जल, जंगल और ज़मीन के संघर्ष की शुरूआत

08. छत्तीसगढ़ राज्य का प्रांरभिक इतिहास

09. कोसल की भाषा कोसली

10. छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक विकास

सम्मान[ संपादित करें

छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य सम्मेलन। श्री चक्रधर कला केंद्र रायगढ़, महात्मा गाँधी जन्म शताब्दी समारोह, मध्यप्रदेश, रविशंकर विश्वविद्यालय, रामचंद्र देशमुख सम्मान, भिलाई, महंत नरेंद्रदास स्मृति सम्मान, भोपाल, छत्तीसगढ़ी साहित्य सम्मेलन द्वारा नागरिक अभिनंदन, रायपुर, महाकोशल अलंकरण आदि सैकड़ो सम्मान एवं पुरस्कार। अनेक विश्वविद्यालयों एवं स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रमों में रचनाओं का समादरण।

सन्दर्भ[संपादित करें]

↑ "हरि ठाकुर". अनुभूति. मूल (एचटीएम) से 19 जुलाई 2008 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 21 अप्रैल 2008. में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
↑ "संस्थापक अध्यक्ष". सृजनगाथा. मूल (एचटीएम) से 13 मई 2008 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 21 अप्रैल 2008. में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
↑ "राज्यनिर्माण के अग्रदूत हरि ठाकुर". सृजनगाथा. मूल (एचटीएम) से 13 मई 2008 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 21 अप्रैल 2008. | में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)

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मिनी माता (छत्तीसगढ़)

दोस्तों, आज हम जानेंगे छत्तीसगढ़ की मिनी माता बारें में जिन्हे छत्तीसगढ़ में माता का दर्जा दिया गया है, ऐसी माता जिन्होंने छत्तीसगढ़ के उत्थान के लिए अनेक काम किये हैं, छत्तीसगढ़ के अंदर मौज़ूद अनेक बुराइयों के लिए आवाज उठायी और उनको दूर भी की, ऐसी ममतामयी माता जिन्होंने सिर्फ और सिर्फ लोगों की भलाई के बारे में ही सोचा। 

 नाम:

 मीनाक्षी देवी (मिनी माता)

 जन्म स्थान:

 नवागांव, असम

 जन्म:

 15 मार्च 1916 

 पिता:

 महंत बुधारीदास 

 माता:

 देवमती बाई

 पति: 

 गुरु अगमदास जी

 निधन:

 11 अगस्त 1972 

जन्म पूर्व घटना:

मीनाक्षी देवी (मिनी माता) का जन्म असम राज्य के नवागांव नामक स्थान पर 15 मार्च 1916 को हुआ था। अब आप सोचेंगे की जन्म तो असम में हुआ था तो फिर मिनी माता जी छत्तीसगढ़ कैसे पहुंची ? परन्तु आपको यह बता देते है की मिनी माता जी का सम्बन्ध छत्तीसगढ़ से ही था परन्तु परिस्थिति ने उनके परिवार को छत्तीसगढ़ से असम पहुंचा दिया था। 

कहा जाता है,कि अकाल किसी को भी राजा से रंक बना सकता है और ऐसा हुआ भी।  बात है, साल 1897 से लेकर 1899 की, इस समय छत्तीसगढ़ में प्रकृति ने अपना कहर बरपाना शुरू किया था, तब इन 2 सालों में ऐसा सूखा पड़ा की, किसान खाने के मोहताज़ हो गए। लोगों का पलायन एक शहर से दूसरे शहर और दूसरे शहरों से अन्य राज्यों में होने लगा। परिस्थिति ऐसी निर्मित हो गयी थी,कि मालगुजारों को भी पलायन करना पड़ रहा था। ऐसे ही तब के बिलासपुर जिले के पंडरिया के पास के गांव सगोना के एक मालगुज़ार थे अघारीदास महंत, जिन्हे भी प्रकृति के इस कहर से बचने के लिए पलायन करना पड़ा था। 

अघारीदास जी को एक ठेकेदार ने आश्वासन दिलाया की असम के चाय के बागानों में उन्हें काम दिलवा देगा, अघारीदास जी अपने अच्छे भविष्य की कामना लिए पलायन करने के लिए अपने पत्नी बुधियारिन और 3 बेटियाँ चांउरमती, पारबती और देवमती के साथ जाने को राज़ी हो गए, परन्तु किस्मत में तो कुछ और ही लिखा था। पलायन के समय कलकत्ता पहुंचने से पहले ही पारबती का निधन हो गया उनके पार्थिव शरीर कोअघारीदास जी को अपनी कांपती हाथों से गंगा नदी में प्रवाहित करना पड़ा। विपत्ति की यह घड़ी अभी कम भी नहीं हुई थी,कि  उनकी दूसरी पुत्री चांउरमती की भी मृत्यु असम पहुंचने से पहले हो गयी। यह घटना अघारीदास और बुधियारिन के लिए किसी बड़े सदमें से कम नहीं था,और  यह दोनों घटनाएं उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल गयी। 

असम पहुंचने के पश्चात किसी तरह उन्हें चाय के बागान में तो काम मिल गया परन्तु उनकी पत्नी बुधियारिन का स्वास्थ्य बिगड़ता चला गया और उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। यह अघारीदास जी के लिए सबसे बड़ी क्षति थी । जिससे उनके लिए इससे पार पाना कठिन हो गया और वे अपने पीछे 6 साल की एक बेटी देवमती को अकेले छोड़ काल के मुँह में समा गए। 6 साल की उस बच्ची को एक दयालु परिवार का सहारा मिला, जिन्होंने उस बच्ची का इलाज कराया, पढ़ाया और काम भी सिखाया जिससे की देवमती को चाय बागान में काम मिल गया, कुछ दिनों बाद देवमती का विवाह बुधारीदास महंत से करवा दिया गया। 

जन्म परिचय : 

15 मार्च 1916 की रात देवमती  के घर एक ऐसी कन्या का जन्म हुआ,जिन्होंने न सिर्फ अपने परिवार रोशन किया  ,बल्कि आगे चलकर पुरे देश में फैले कुरीतियों का भी नाश किया। इस कन्या का नाम मीनाक्षी रखा गया, जिसे लोग प्यार से मिनी के नाम से भी बुलाते थे। मिडिल स्कुल  तक की शिक्षा मिनी ने असम से ही प्राप्त की जो उनके जीवन में मिल का पत्थर साबित हुआ। 1920 के आते आते देश में स्वराज आंदोलन शुरू हो चुके थे, जिनका अमिट छाप मिनी माता के में भी दिखने लगा था।  उन्होंने "बच्चा पार्टी" के सदस्य के रूप में भी काम किया था, गाँधी जी द्वारा चलाए जाने वाले स्वदेशी अभियान में भी सम्मिलित हुई, इस अभियान से जुड़ने के बाद से ही मिनीमाता जी  ने स्वदेशी वस्त्र धारण करना शुरू कर दी थी। 

विवाह:

बात उस समय की है जब देश में सतनाम पंथ का प्रचार-प्रसार तत्कालीन धर्मगुरु गुरु अगमदास जी के ऊपर था। गुरु अगमदास जी इसी के लिए असम प्रवास पर थे और वे मिनी माता के परिवार में ही रुके थे, अगमदास जी निःशंतान होने के कारण अपने परिवार और उत्तराधिकारी को लेकर चिंतित थे और यह चिंता उन्होंने मिनी माता के परिवार के साथ भी साझा किया, देवमती जी ने संकेत समझकर 1932 में मिनी माता का विवाह गुरु अगमदास जी से करवा दी। इस प्रकार मिनी माता पुनः असम से छत्तीसगढ़ पहुँच जाती है। 

मिनी से मिनी माता बनने का सफ़र:

गुरु अगमदास जी छत्तीसगढ़ के एक प्रसिध्द व्यक्ति थे जिनका सतनाम समाज में काफी प्रभाव था, जिसके कारण उनके घर में तब के स्वतंत्रता सेनानियों का जमावड़ा लगा करता था और यह काफी सुरक्षित भी था। इन स्वतंत्रता सेनानियों का प्रभाव मिनी माता के स्वाभाव में भी दिखने लगा था। इन्ही सब कारणों से उनकी मन में भी समाज और देश के लिए कुछ करने की भावना बलवती होती गयी। 

जैसे ही लगता है सब कुछ अच्छा चल रहा है, विधि का विधान कुछ और ही सोच कर बैठा होता है, 1954  में गुरु अगमदास जी की मृत्यु के बाद कर्तव्य का सारा बोझ मीनाक्षी देवी के कन्धों पर आ गया था,क्योकि उस समय उनके बेटे विजय कुमार की उम्र काफी काम थी, जो इस कर्तव्य को उठाने के लायक नहीं हुए थे। मीनाक्षी देवी अपने पारिवारिक दायित्व का अच्छे से निर्वहन करने के साथ-साथ सामाजिक दायित्व का भी काफी अच्छे से निर्वहन कर रही थी, जिसके कारण उनकी प्रसिद्धि काफी बढ़ गयी थी। वर्ष 1955 के उपचुनाव में संयुक्त संसदीय क्षेत्र रायपुर,बिलासपुर और दुर्ग में अपना परचम लहराकर छत्तीसगढ़ की प्रथम महिला सांसद होने का गौरव उन्हें प्राप्त हुआ। 

मिनी माता का राजनितिक सफर:

1955 उपचुनाव जीतकर में सर्वप्रथम महिला सांसद बनने का गर्व प्राप्त हुआ। 
1957 में पुनः संयुक्त संसदीय क्षेत्र रायपुर,बिलासपुर और दुर्ग से जीतकर सांसद बनी। 
1962 में बलौदाबाजार क्षेत्र से 52 फीसदी ज्यादा मतों से जीतकर दिल्ली में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व की। 
1967 में जांजगीर संसदीय क्षेत्र से पिछले बार से ज्यादा मत प्रतिशत के साथ जीतकर सांसद में अपना दमदार प्रतिनिधित्व का लोहा मनवाई। 
मिनी माता ने 1971 के चुनाव में पुनः जांजगीर क्षेत्र से चुनाव जीतकर पांच बार चुनाव जितने का तमगा हासिल की। 

मिनी माता की राजनितिक उपलब्धियाँ:

वैसे तो मिनी माता ने ऐसे अनेक कार्य किये है जो उन्हें मीनाक्षी देवी से मिनी माता का दर्जा प्रदान किया। इसमें से कुछ प्रमुख उनलब्धियां निम्नांकित है:

1955 में अपने दम पर अस्पृश्यता बिल संसद में पास करवाया जो की पुरे देश में विशेष समुदाय के लोगों को उनका हक़ दिलवाने का काम किया। 
1967 में एक बहुत बड़ी रैली का नेतृत्व मिनी माता के द्वारा किया गया, यह रैली भिलाई स्टील प्लांट के द्वारा 1966 में मजदूरों की छटनी के विरोध में चलाया गया था। इसी रैली के फलस्वरूप ही हज़ारों मजदूरों को काम से नहीं निकाला गया। 
1968 जातिगत भेदभाव के कारण होने वाले लड़ाइयों के लिए भी आवाज बुलंद की, जिसके फलस्वरूप ही बहुत से जगह जातिगत भेदभाव को काम करने में सफलता हासिल हुई।  
मिनी माता जी राज्य कांग्रेस समिति के महासचिव के पद पर भी रहीं। 
गुरु घासीदास सेवा संघ और हरिजन एजुकेशन सोसाइटी के अध्यक्ष के पद पर भी रही। 
इन्होने स्टेट डिप्रेस्ड लीग की उपाध्यक्ष के पद को भी सुशोभित किया। 
मीनाक्षी देवी महिला मंडल रायपुर के सचिव के पद पर रहते हुए महिला उत्थान के अनेक कार्य किये।
मिनी माता जी ने सामाजिक कल्याण बोर्ड और जिला कांग्रेस समिति के सदस्य के रूप में भी कार्य किया। 

मिनी माता द्वारा सामाजिक कार्य:

मिनी माता ने सामाजिक उत्थान के अनेक कार्य किये, जो उनके कद को सामाजिक क्षेत्र में और बढ़ा देता है। 
उन्होंने गावों के विकास और उत्थान में अपना अमूल्य योगदान दिया, जिससे उनकी ख्याति जन- जन तक बढ़ती चली गयी। 
दहेज़ प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ अपना अमूल्य योगदान दिया तथा इसके लिए अनेक कार्य किये। 
शारीरिक रूप से विकलांग और गरीबों के विकास में मीनाक्षी देवी का योगदान सर्वोपरिय था। 
मिनी माता जी ने महिलाओं की शिक्षा को लेकर अनेक अभियान चलाये जिससे की महिलाओं को समाज में उनका हक़ मिल सकें। 
महिलाओं के साथ-साथ उनके बाल कल्याण के लिए योगदान अत्यंत सराहनीय था। 
ग्रामीणों को स्वच्छता का सन्देश उनका सहयोग ग्रामीणों के विकास के लिए एक अहम् योगदान था। 
चूँकि,उस समय हरिजन छात्रों को पढ़ाई के लिए दूसरे किसी जगह जाने पर रहने के लिए आश्रय कोई देने को तैयार नहीं होता था,इस बुराई को कम करने के लिए उन्होंने हरिजन छात्रावास के निर्माण में भी जोर दिया। 
समाज में व्याप्त अस्पृश्यता नामक राक्षस से लड़ने में उन्होंने सबसे अधिक योगदान दिया। 

निधन:

ममतामयी मिनी माता का निधन दिल्ली प्रवास के दौरान हवाई जहाज दुर्घटना के कारण 11 अगस्त 1972 को हुआ। यह क्षति छत्तीसगढ़ के लिए सबसे अधिक पीड़ा प्रदान करने वाली थी। सतनामी समाज की गुरु माता की समाधि रायपुर बिलासपुर हाईवे में स्थित,सिमगा से 3 किलोमीटर की दूरी में बसे खडुवापुरी नामक गाँव में गुरु अगमदास जी के समाधी के पास में ही मिनी माता जी  की भी समाधि बनायी गई  है। यह स्थली सतनामी समाज के लिए एक सामाजिक महत्व देने वाली स्थली के रूप में चिन्हांकित है। 

गौरव:

मिनी माता जी द्वारा किये गए सामाजिक उत्थान के काम और उनके ममतामयी स्वाभाव के कारण ही छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद महिला एवं बाल  विकास विभाग द्वारा छत्तीसगढ़ में महिला कल्याण के लिए काम करने वाली महिलाओं या समूहों को हर साल "मिनी माता सम्मान" से नवाजा जाता है। उनके नाम से रायपुर बस स्टैंड का नाम रखा गयासाथ ही उनके स्मृति को बनाये रखें के लिए अनेक स्कूलों और कॉलेजों का नाम भी इन्ही के नाम से रखा गया। हसदेव बांगो परियोजन का नाम भी मिनी माता बांगों परियोजना रखा गया है। छत्तीसगढ़ के विधानसभा भवन का नाम भी ममतामयी माता "मिनी माता" के नाम से किया गया है। 

(नोट: उपरोक्त जानकारी में से कुछ अंश हरिभूमि में प्रकाशित लेख से लिया गया है तथा वर्षों की जानकारी पांचवी लोकसभा Bioprofile से लिया गया है।)

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चंदूलाल चंद्राकर

चंदूलाल चंद्राकर (1 जनवरी 1920 - 2 फरवरी 1995) एक भारतीय पत्रकार और राजनीतिज्ञ थे, जो मध्य प्रदेश राज्य के दुर्ग (लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र) का प्रतिनिधित्व करने वाली 10वीं लोकसभा के सदस्य थे।[1] उन्हें भारतीय संसद की चौथी, 5वीं, 7वीं और 8वीं लोकसभा के सदस्य के रूप में भी चुना गया था।

पूर्व जीवन

चंद्राकर का जन्म 1 जनवरी 1920 को दुर्ग जिले के निपानी गांव में हुआ था। चंद्राकर 1945 में हिंदुस्तान टाइम्स के लिए पत्रकार बने, उनकी कहानियाँ अन्य भारतीय और विदेशी समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुईं। उन्होंने नौ ओलंपिक खेलों और तीन एशियाई खेलों पर रिपोर्टिंग की। चंद्राकर ने डेली इंडिया में संपादक के रूप में कार्य किया।

1970 में चंद्राकर पहली बार पांच बार लोकसभा के लिए चुने गए। मैंने पर्यटन, नागरिक उड्डयन, कृषि, ग्रामीण विकास मंत्री के रूप में कार्य किया है। चंद्राकर अखिल भारतीय कमेटी के महासचिव और मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता बने।[3] छत्तीसगढ़ प्रदेश सर्वदलीय मंच के अध्यक्ष रहे

चंद्राकर की मृत्यु 2 फरवरी 1995 को हुई।[उद्धरण वांछित]

छत्तीसगढ़ सरकार ने उनकी स्मृति में चंदूलाल चंद्राकर फ़ेलोशिप की स्थापना की 

सन्दर्भ

1. ^एशियाई रिकॉर्डर। एशिया: रिकॉर्डर प्रेस में के.के. थॉमस। 1995. पी. 24611.

2. ^ "प्रथम लोकसभा सदस्यों की बायोप्रोफाइल"। लोकसभा सचिवालय, नई दिल्ली। 21 नवंबर 2017 को लिया गया.

3. ^ किदवई, रशीद (6 मई, 2011)। सोनिया: एक जीवनी. पेंगुइन यूके। आईएसबीएन 978-81-8475-249-6।

4. ^ रेखा, रत्नानी; पूनम, घोरमोडे; अंजू, पुंगले (2017)। "ग्रामीण भारत में गर्भाशय ग्रीवा के प्रारंभिक घावों का पता लगाने के लिए एक बुनियादी स्क्रीनिंग दृष्टिकोण: एक संभावित अवलोकन अध्ययन।" इंडियन जर्नल ऑफ ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनोकोलॉजी। 5 (3): 335-341. doi:10.21088/ijog.2321.1636.5317.2. आईएसएसएन 2321-1636.

5. ^ चंद्राकर, चंदूलाल, 1920- (1984)। पाकिस्तान युद्ध मुद्राएँ. एआईसीसी(आई). ओसीएलसी 42260369.

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